क्या बिहार अब जाति नहीं, मुद्दों की राजनीति की ओर बढ़ रहा

— चंदन चौरसिया
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक

क्या बिहार अब जाति नहीं, मुद्दों की राजनीति की ओर बढ़ रहा

एक वोट, दो संदेश: सत्ता को सबक और पीके को चुनौती

छात्र, बेरोजगारी और सत्ता विरोधी लहर: बीजेपी की हार की 10 बड़ी वजहें

 

बिहार की राजनीति में बांकीपुर उपचुनाव का परिणाम केवल एक सीट का चुनावी नतीजा नहीं है, बल्कि यह जनता के मन में चल रही उन तमाम भावनाओं, नाराजगियों और उम्मीदों का प्रतिबिंब भी है, जो पिछले कुछ वर्षों में धीरे-धीरे आकार ले रही थीं। देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बीजेपी को इस उपचुनाव में मिली हार ने राजनीतिक विश्लेषकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर वह कौन से कारण थे जिन्होंने इतना बड़ा उलटफेर कर दिया।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस चुनाव में जनता ने केवल उम्मीदवार नहीं चुना, बल्कि एक संदेश दिया है। यह संदेश सत्ता को भी है और विपक्ष को भी। यह संदेश उन नेताओं को भी है जो जनता के बीच से निकलकर बड़े पदों तक पहुंचे और उन नए चेहरों को भी है जो बदलाव की राजनीति का दावा कर रहे हैं।

• पहला फैक्टर: नेतृत्व, जनसंपर्क और बढ़ती दूरी की भावना

चुनाव के दौरान एक चर्चा लगातार सुनाई दी कि जिन नेताओं को जनता और कार्यकर्ताओं ने अपने समर्थन से आगे बढ़ाया, उनके राष्ट्रीय राजनीति में पहुंचने के बाद आम कार्यकर्ता और समर्थक खुद को उनसे दूर महसूस करने लगे। विशेष रूप से कायस्थ समाज के कुछ लोगों के बीच यह भावना देखने को मिली कि जिन नेताओं को उन्होंने अपने वोट और समर्थन से बड़ा बनाया, वे अब पहले की तरह उपलब्ध नहीं हैं।
राजनीति में कई बार वास्तविकता से अधिक धारणा काम करती है। यदि कार्यकर्ता और समर्थक यह महसूस करने लगें कि नेता अब जनता से कट गया है, तो उसका असर चुनावी नतीजों में दिखाई देता है। बांकीपुर उपचुनाव में यह भावना भी चर्चा का विषय बनी रही।

• दूसरा फैक्टर: मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर असंतोष

बिहार में मुख्यमंत्री पद से जुड़े हालिया फैसले को लेकर जनता के एक वर्ग में असंतोष देखने को मिला है। इसके साथ ही पार्टी के भीतर भी मतभेद और असंतोष की चर्चाएं सामने आई, बाहरी व्यक्ति को मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी दिए जाने का निर्णय भी कई लोगों को स्वीकार्य नहीं लगा और कुछ लोगों ने इसे वैचारिक बदलाव के बजाय केवल राजनीतिक प्रस्तुति के रूप में देखा, जिसके कारण असंतोष की भावना सामने आई है।
वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया का मानना है कि जब किसी राज्य में जनता को यह महसूस होता है कि उसके ऊपर नेतृत्व थोपा जा रहा है या स्थानीय भावनाओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा, तो उसका असर मतदान पर पड़ता है। बांकीपुर में भी इस तरह की चर्चाएं चुनावी माहौल का हिस्सा रहीं।

• तीसरा फैक्टर: नीतीश कुमार का राजनीतिक अध्याय और जनता की प्रतिक्रिया

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार एक बड़ा नाम रहे हैं। समर्थक हों या विरोधी, दोनों मानते हैं कि उन्होंने लंबे समय तक बिहार की राजनीति को दिशा दी है। ऐसे में मुख्यमंत्री पद से उनके हटने और बदलते राजनीतिक समीकरणों को जनता ने गंभीरता से देखा। कई मतदाताओं के बीच यह भावना भी दिखाई दी कि राजनीतिक स्थिरता और नेतृत्व की निरंतरता टूटने से भ्रम की स्थिति पैदा हुई। इसका असर भी चुनावी माहौल पर देखने को मिला।

• चौथा फैक्टर: पेपर लीक और छात्रों का आक्रोश

यदि इस चुनाव में किसी वर्ग की नाराजगी सबसे अधिक दिखाई दी, तो वह युवा वर्ग था। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों छात्र पहले से ही रोजगार की चिंता से जूझ रहे हैं। ऐसे में बार-बार पेपर लीक की खबरों ने युवाओं के धैर्य की परीक्षा ली। छात्रों के बीच यह भावना मजबूत हुई कि उनकी मेहनत और भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। चुनाव में युवा मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग इसी नाराजगी के साथ मतदान केंद्रों तक पहुंचा।

• पांचवां फैक्टर: बीपीएससी आंदोलन और छात्रों पर कार्रवाई

बीपीएससी और अन्य भर्ती परीक्षाओं को लेकर हुए आंदोलनों ने बिहार के युवाओं को गहराई से प्रभावित किया। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक छात्रों का गुस्सा दिखाई दिया। विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई और छात्रों के साथ कथित दुर्व्यवहार को लेकर भी व्यापक चर्चा हुई। चुनाव में यह मुद्दा बार-बार सामने आया और युवाओं ने इसे अपनी प्राथमिक चिंताओं में शामिल रखा।

• छठा फैक्टर: ई-20 ईंधन पर उठते सवाल

पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण को लेकर भी राजनीतिक बहस देखने को मिली। सरकार इसे ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण हित में बड़ा कदम बता रही है, जबकि विरोधी पक्षों ने इसे आम जनता की जेब और वाहन चालकों की चिंता से जोड़कर पेश किया। ग्रामीण क्षेत्रों और मध्यम वर्ग के बीच इस विषय को लेकर कई तरह की चर्चाएं और आशंकाएं दिखाई दीं। चुनावी माहौल में यह मुद्दा भी चर्चा का हिस्सा बना रहा।

• सातवां फैक्टर: राम मंदिर से जुड़े विवादों की चर्चा

राम मंदिर भाजपा की सबसे बड़ी वैचारिक उपलब्धियों में गिना जाता है। लेकिन चुनाव के दौरान मंदिर प्रबंधन और दान से जुड़े कुछ विवादों की चर्चाएं भी राजनीतिक मंचों पर सुनाई दीं। भले ही इन दावों और आरोपों पर अलग-अलग पक्षों की अलग राय हो, लेकिन विपक्ष ने इन्हें जनता के बीच उठाने की कोशिश की। इससे राजनीतिक बहस को नई दिशा मिली।

• आठवां फैक्टर: कानून-व्यवस्था और बेगूसराय की घटना

बेगूसराय में छात्रा के साथ हुई गैंगरेप की घटना को लेकर भी चुनावी माहौल में चर्चा रही। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए। बिहार की राजनीति में सुरक्षा हमेशा एक बड़ा मुद्दा रही है। ऐसे में किसी भी गंभीर अपराध की घटना का राजनीतिक असर होना स्वाभाविक माना जाता है।

• नौवां फैक्टर: राजा तिवारी एनकाउंटर विवाद

राजा तिवारी एनकाउंटर को लेकर भी समाज के विभिन्न वर्गों में बहस देखने को मिली। कुछ लोगों ने इसे कानून का कड़ा संदेश बताया, जबकि कुछ ने इसे सवालों के घेरे में रखा। चुनाव के दौरान यह मुद्दा भी राजनीतिक चर्चाओं में शामिल रहा और विभिन्न वर्गों ने इसे अपने-अपने नजरिए से देखा।

• दसवां फैक्टर: सत्ता विरोधी भावना

बीजेपी ने कहा था कि पार्टी चुनाव लड़ती है कैंडिडेट नहीं इस लिए पार्टी कुत्ता बिल्ली को भी चुनाव लड़ाएगी तो वो भी चुनाव जीत जाएगी लोकतंत्र का सबसे बड़ा सच यही है कि कोई भी पार्टी हमेशा जनता का विश्वास अपने पास नहीं रख सकती। लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद जनता बदलाव की ओर देखने लगती है। बांकीपुर उपचुनाव में भी यह भावना दिखाई दी कि मतदाता सत्ता को यह याद दिलाना चाहता है कि लोकतंत्र में अंतिम ताकत जनता के पास होती है। जब जनता को लगता है कि उसके सवालों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा, तो वह मतदान के माध्यम से जवाब देती है।

• जाति से ऊपर उठकर वोट?

बिहार की राजनीति लंबे समय से जातीय समीकरणों के लिए जानी जाती रही है। लेकिन बांकीपुर उपचुनाव में कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने यह महसूस किया कि बड़ी संख्या में मतदाताओं ने रोजगार, शिक्षा, भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और नेतृत्व जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दी।
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि बिहार पूरी तरह जातीय राजनीति से बाहर निकल चुका है, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि मुद्दों की राजनीति की मांग पहले से ज्यादा मजबूत हुई है।

• आखिर प्रशांत किशोर क्यों जीते?

प्रशांत किशोर को इस चुनाव में केवल एक उम्मीदवार के रूप में नहीं देखा गया। बड़ी संख्या में मतदाताओं ने उन्हें एक राजनीतिक विकल्प के रूप में देखा। वर्षों तक राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में काम करने वाले प्रशांत किशोर ने खुद को बदलाव की राजनीति के चेहरे के रूप में प्रस्तुत किया।
जनता के एक वर्ग ने उन्हें इसलिए वोट दिया क्योंकि वह पारंपरिक राजनीति से अलग कुछ देखना चाहता था। यह जीत उम्मीदों की जीत है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारियां भी उतनी ही बड़ी हैं।

• अब सबसे बड़ी परीक्षा प्रशांत किशोर की

चुनाव जीतना एक उपलब्धि है, लेकिन जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना उससे कहीं बड़ी चुनौती है। जिन मुद्दों को लेकर वोट मांगा गया, अब जनता उन पर काम होते हुए देखना चाहती है। उसे कितना जमीन पर उतार पाते है या ये भी सिर्फ जुमलेबाजी करते है और नेता की तरह अपनी रोटी सेकने के लिए तवा गर्म करते है।

यदि नई राजनीति भी पुराने राजनीतिक ढर्रे पर चलने लगी, यदि मुद्दों की जगह बयानबाजी ने ले ली, यदि जनता की अपेक्षाएं पूरी नहीं हुईं, तो वही जनता जिसने सिर पर बिठाया है, वह सवाल भी पूछेगी।बांकीपुर का जनादेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल बीजेपी की हार या प्रशांत किशोर की जीत की कहानी नहीं है। यह उस बदलते बिहार की कहानी है जो अब नेताओं से वादे नहीं, परिणाम मांग रहा है। यह उस मतदाता की कहानी है जो जाति से आगे बढ़कर अपने भविष्य पर वोट करना चाहता है। और यह उस लोकतंत्र की कहानी है जहां जनता समय-समय पर सत्ता को याद दिलाती रहती है कि असली ताकत जनता के हाथ में ही होती है।

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