नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच भले ही फिलहाल सीजफायर लागू हो, लेकिन दोनों देशों के रिश्तों में तनाव कम होने के संकेत नहीं मिल रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि यदि समझौता नहीं हुआ तो सैन्य कार्रवाई का विकल्प भी खुला रहेगा। परमाणु कार्यक्रम, होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव और सुरक्षा गारंटी जैसे अहम मुद्दों पर दोनों देशों के बीच सहमति नहीं बन पा रही है, जिससे क्षेत्र में बड़े संघर्ष की आशंका बढ़ गई है।
इसी बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने ओमान के विदेश मंत्री बद्र अलबुसैदी से फोन पर बातचीत कर मौजूदा हालात और शांति बहाली के प्रयासों पर चर्चा की। ईरान ने स्पष्ट किया है कि वह कूटनीतिक रास्ते से अमेरिका और इजरायल के साथ जारी तनाव को खत्म करना चाहता है, लेकिन जमीनी स्थिति अब भी सामान्य नहीं हो सकी है।
दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता बार-बार तीन प्रमुख मुद्दों पर अटक रही है—ईरान का परमाणु कार्यक्रम, होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री गतिविधियों पर नियंत्रण और भविष्य में हमले नहीं करने की गारंटी। अमेरिका इन मामलों में सख्त रुख अपनाए हुए है, जबकि ईरान भी अपनी शर्तों से पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहा।
डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि ईरान पहले के मुकाबले कमजोर स्थिति में है और समझौते के लिए दबाव में है। उन्होंने कहा कि डील का प्रारूप अमेरिकी प्रशासन के पास पहुंच चुका है और जल्द ही इस पर फैसला लिया जाएगा। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ईरान ने कोई “गलत कदम” उठाया, तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगा।
उधर, होर्मुज स्ट्रेट को लेकर तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों और समुद्री दबाव का असर ईरान की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई दे रहा है। तेल उत्पादन के बावजूद ईरान को निर्यात में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उसकी आय प्रभावित हुई है। इसका असर उन देशों पर भी पड़ रहा है, जो ईरानी तेल पर निर्भर हैं, खासकर चीन।
ईरानी मीडिया के मुताबिक, अमेरिका की शर्तों के जवाब में तेहरान ने नया प्रस्ताव भेजा है। इस प्रस्ताव में चरणबद्ध तरीके से तनाव कम करने की योजना, होर्मुज क्षेत्र में राहत और परमाणु मुद्दे पर सीमित लचीलापन शामिल है। साथ ही ईरान ने प्रतिबंधों में ढील और सुरक्षा गारंटी की मांग दोहराई है।
ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा कि उनका देश बातचीत और शांति के लिए तैयार है, लेकिन राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब यह अमेरिका पर निर्भर करता है कि वह कूटनीति को प्राथमिकता देता है या टकराव का रास्ता अपनाता है।
फिलहाल दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है, लेकिन आपसी अविश्वास और कड़ी शर्तों के चलते समझौते की राह मुश्किल नजर आ रही है। पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या यह नया प्रस्ताव मध्य पूर्व में शांति ला पाएगा या क्षेत्र किसी बड़े संकट की ओर बढ़ेगा।