नई दिल्ली- राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवारा पशुओं से होने वाले हादसों पर तकनीकी प्रहार

New Delhi: Technological action to curb accidents caused by stray animals on national highways

राष्ट्रीय राजमार्गों पर रात के समय अचानक सामने आ जाने वाले आवारा पशु लंबे समय से गंभीर सड़क हादसों की बड़ी वजह बने हुए हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए अब नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) ने तकनीक आधारित एक नई पहल की शुरुआत की है, जिसका मकसद है—हादसे से पहले ही ड्राइवर को सतर्क करना।

रोड सेफ्टी मंथ 2026 के तहत NHAI ने रियल-टाइम स्ट्रे कैटल सेफ्टी अलर्ट सिस्टम का पायलट प्रोजेक्ट लॉन्च किया है। फिलहाल यह प्रयोग जयपुर–आगरा और जयपुर–रेवाड़ी राष्ट्रीय राजमार्ग कॉरिडोर पर लागू किया गया है। ये दोनों इलाके आवारा पशुओं की अधिक आवाजाही के कारण हाई-रिस्क ज़ोन माने जाते हैं।

हादसे से पहले मिलेगी चेतावनी
इस पायलट प्रोजेक्ट के तहत जैसे ही कोई वाहन चिन्हित कैटल-प्रोन ज़ोन की ओर बढ़ता है, ड्राइवर को लगभग 10 किलोमीटर पहले मोबाइल फोन पर अलर्ट भेजा जाएगा। पहले फ्लैश SMS और फिर वॉयस अलर्ट मिलेगा—
“आगे आवारा पशु ग्रस्त क्षेत्र है। कृपया धीरे और सावधानी से चलें।”

इसका उद्देश्य ड्राइवर को अतिरिक्त समय और दूरी देना है, ताकि वह रफ्तार कम कर सके और संभावित टक्कर से बचा जा सके। बार-बार नोटिफिकेशन से बचने के लिए एक ही यूज़र को 30 मिनट के भीतर दोबारा अलर्ट नहीं भेजा जाएगा।

क्यों ज़रूरी है यह पहल?
सरकारी रिपोर्टों के मुताबिक भारत में हर साल लाखों सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, जिनमें सबसे ज्यादा मौतें राष्ट्रीय राजमार्गों पर दर्ज होती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कम दृश्यता (कोहरा, रात, बारिश) और अचानक सामने आ जाने वाले आवारा पशु—यह संयोजन खासकर उत्तर भारत के हाईवे पर बेहद घातक साबित होता है।

कैसे काम करता है यह सिस्टम?
यह अलर्ट सिस्टम पुराने दुर्घटना आंकड़ों, फील्ड-लेवल इनपुट और चिन्हित कैटल-प्रोन ज़ोन के डेटा पर आधारित है। जैसे ही कोई वाहन ऐसे क्षेत्र के पास पहुंचता है, लोकेशन-बेस्ड अलर्ट स्वतः ट्रिगर हो जाता है। इस परियोजना के लिए रिलायंस जियो ने अपने प्लेटफॉर्म को अपग्रेड किया है, ताकि भविष्य में इसे पूरे देश में लागू किया जा सके।

NHAI के अनुसार, पायलट प्रोजेक्ट के दौरान यह परखा जाएगा कि:

  • क्या सड़क हादसों में कमी आई?
  • क्या ड्राइवरों के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव हुआ?

यदि परिणाम सकारात्मक रहे, तो इस सिस्टम को अन्य आवारा पशु-प्रभावित राष्ट्रीय राजमार्गों तक विस्तार दिया जाएगा।

आंकड़े जो चिंता बढ़ाते हैं
अध्ययन बताते हैं कि राष्ट्रीय राजमार्ग भारत के कुल सड़क नेटवर्क का केवल करीब 2 प्रतिशत हैं, लेकिन सड़क हादसों में होने वाली 30 प्रतिशत से अधिक मौतें इन्हीं पर होती हैं। संसद में दी गई सरकारी जानकारी के अनुसार:

  • वर्ष 2024 में सड़क दुर्घटनाओं में कुल 1,77,177 लोगों की मौत हुई—औसतन हर दिन 485 मौतें।
  • 2025 के पहले छह महीनों (जनवरी–जून) में ही राष्ट्रीय राजमार्गों पर 26,770 लोगों की जान जा चुकी है।

ये आंकड़े सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के आधिकारिक डेटा पर आधारित हैं।

प्रिवेंटिव अप्रोच की ओर बड़ा कदम
स्पष्ट है कि सड़क सुरक्षा अब केवल इंफ्रास्ट्रक्चर या नियमों तक सीमित विषय नहीं रही। मोबाइल-आधारित रियल-टाइम अलर्ट जैसी पहलें हाईवे सेफ्टी की दिशा बदल रही हैं। NHAI का यह रियल-टाइम स्ट्रे कैटल अलर्ट सिस्टम एक रिएक्टिव नहीं, बल्कि प्रिवेंटिव मॉडल का उदाहरण है—जहां हादसे के बाद नहीं, बल्कि हादसे से पहले चेतावनी दी जा रही है।

यदि यह पहल सफल रहती है और देशभर में लागू होती है, तो यह न केवल हजारों जानें बचा सकती है, बल्कि भारत की सड़क सुरक्षा नीति में एक निर्णायक बदलाव की नींव भी रख सकती है।

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