
रुपेश कुमार सिंह
चौथी वाणी, पटना
आरक्षण और स्वर्ण समाज – आज की स्थिति
1. तथ्य:
– शुरुआत: 1950 में SC/ST के लिए 10 साल आरक्षण। कारण: सदियों का शैक्षिक-सामाजिक पिछड़ापन।
– विस्तार: 1990 में OBC 27%, और 2019 में EWS 10% – ये स्वर्ण समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए है। आय सीमा ₹8 लाख/साल।
– आज का सच: 50% से ज्यादा सीटें अब भी “General” कैटेगरी की हैं। UPSC में 50% सीट, IIT में ∼40% सीट General/EWS की हैं।
2 सच्चाई साथ चल रही हैं:
1. मेरिट की पीड़ा: 95% लाने वाले को भी सीट न मिलना दुख देता है। इससे पलायन और निराशा बढ़ती है।
2. सामाजिक न्याय: आज भी कई जिलों में SC/ST की साक्षरता राष्ट्रीय औसत से 15-20% कम है। उनके लिए आरक्षण “पहला मौका” है।
रास्ता: देश के नीति निर्माता अब “आरक्षण + गुणवत्ता वाली शिक्षा” की बात करते हैं। जब सरकारी स्कूल सबके लिए बराबर होंगे, तब प्रतिस्पर्धा भी बराबर होगी।
2. आजादी से पहले महिलाएं – “क्या आरक्षण से ही आगे बढ़ीं?”
7.3% साक्षरता के बावजूद ये महिलाएं आगे आईं, बिना किसी आरक्षण के:
| क्रम | नाम | राज्य | उपलब्धि |
| 1 | सरोजिनी नायडू | हैदराबाद | भारत कोकिला, UP की पहली राज्यपाल |
| 2 | राजकुमारी अमृत कौर | लखनऊ | पहली स्वास्थ्य मंत्री, AIIMS की नींव |
| 3 | विजयलक्ष्मी पंडित | इलाहाबाद | UNO में भारत की पहली महिला राजदूत |
| 4 | दुर्गाबाई देशमुख | आंध्र वकील | आंध्र महिला सभा संस्थापक |
| 5 | हंसा मेहता | गुजरात | UN में “All Human Beings” शब्द जुड़वाया |
| 6 | डॉ. आनंदीबाई जोशी | महाराष्ट्र | भारत की पहली महिला डॉक्टर – 1886 |
| 7 | आइला मल्लिका | कोलकाता | 1943 में पहली महिला इंजीनियरों में से एक |
मतलब: महिला आगे बढ़ी “शिक्षा + परिवार के सहयोग + व्यक्तिगत संघर्ष” से। आरक्षण से नहीं। महिलाओं के लिए लैंगिक आधार पर नौकरी-शिक्षा में आरक्षण आज भी नहीं है।
3. इतिहास वाला बिंदु – “चमर वंश का शासन” और सामाजिक व्यवस्था
– भारत का इतिहास 5000 साल पुराना है। इसमें उतार-चढ़ाव आए।
तथ्य:
1. चंद्रवंश/सूर्यवंश: प्राचीन काल में अलग-अलग वर्ण/जाति के राजा हुए। हाँ, इतिहास में चमार/जाटव समुदाय के भी शासक रहे हैं – जैसे मध्य काल में कनबीर, और आधुनिक में मायावती जैसी राजनीतिक नेतृत्व।
2. इस्लामी काल 1200-1700 और अंग्रेजी काल 1757-1947: इन 700 सालों में महिलाओं पर पर्दा प्रथा, बाल विवाह, सती जैसी सामाजिक कुरीतियां बढ़ीं। शिक्षा महंगी और दुर्लभ हो गई। इसी वजह से 1947 में महिला साक्षरता 7.3% रह गई।
3. संविधान सभा का मकसद: 1949 में नेताओं ने तय किया कि “अतीत में किसने क्या किया” इस बहस में न उलझकर “भविष्य में सबको बराबर मौका कैसे दें” इस पर काम करें।
इसलिए संविधान में “भेदभाव खत्म करो” लिखा, “बदला लो” नहीं लिखा।
निष्कर्ष
1. आरक्षण एक अस्थायी उपाय था। अब EWS से स्वर्ण समाज भी जुड़ गया है।
2. महिलाएं आरक्षण से नहीं, संघर्ष से आगे बढ़ीं।
3. देश का विकास तब होगा जब “योग्यता” को मौका मिले और “वंचित” को सीढ़ी मिले।
न मेरिट को नजरअंदाज करो, न वंचित को भूलो”