नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अब युद्ध जैसे हालात तक पहुंच गया है। पाकिस्तान में हुई शांति वार्ता बेनतीजा रहने के बाद दोनों देशों के बीच बयानबाजी और टकराव तेज हो गया है। एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर नाकाबंदी का ऐलान किया है, वहीं ईरान ने भी तेल सप्लाई को लेकर सख्त जवाबी चेतावनी दी है। इस पूरे भू-राजनीतिक संकट में अब चीन की सीधी एंट्री ने हालात और जटिल बना दिए हैं।
चीन ने अमेरिका की ओर से दी गई भारी टैरिफ चेतावनी पर कड़ा रुख अपनाते हुए साफ कहा है कि वह ईरान के साथ अपने संबंधों से पीछे नहीं हटेगा। ट्रंप द्वारा 50 फीसदी टैरिफ लगाने की धमकी के बाद चीन खुलकर ईरान के समर्थन में आ गया है और अमेरिका को उसके आंतरिक मामलों में दखल न देने की चेतावनी दी है।
दरअसल, हाल ही में चीन द्वारा ईरान को सैन्य मदद दिए जाने की खुफिया जानकारी सामने आने के बाद ट्रंप ने कड़ा रुख अपनाया था। उन्होंने साफ कहा था कि यदि चीन ईरान की सैन्य सहायता करता पाया गया, तो उस पर भारी आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाएंगे। इस बयान के बाद दोनों महाशक्तियों के बीच तनाव और बढ़ गया है।
इसी बीच चीन के रक्षा मंत्री Dong Jun ने भी स्पष्ट कर दिया कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान का नियंत्रण है और यह मार्ग उनके लिए खुला है। उन्होंने कहा कि चीनी जहाज इस रास्ते से लगातार आवाजाही करते रहेंगे और चीन अपने ऊर्जा एवं व्यापारिक समझौतों का पालन करेगा।
अमेरिका द्वारा होर्मुज क्षेत्र में नाकाबंदी लागू करने के फैसले को रणनीतिक तौर पर चीन को घेरने की कोशिश माना जा रहा है। यूएस सेंट्रल कमांड के मुताबिक, 13 अप्रैल से ईरानी बंदरगाहों से जुड़े समुद्री मार्गों पर प्रतिबंध लागू कर दिया गया है, हालांकि अन्य देशों के जहाजों को छूट दी गई है।
इस कदम का सबसे बड़ा असर चीन पर पड़ सकता है, क्योंकि वह ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान पर कार्रवाई के जरिए अमेरिका ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं—एक तरफ ईरान पर दबाव और दूसरी तरफ चीन की ऊर्जा आपूर्ति पर चोट।