नई दिल्ली: भारत-अमेरिका ट्रेड डील की शर्तें बढ़ा सकती हैं पेट्रोल-डीजल के दाम, आम आदमी पर पड़ सकता है बोझ

New Delhi: The terms of the India-US trade deal could increase petrol and diesel prices, potentially burdening the common man.

नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच संभावित ट्रेड डील को लेकर चर्चाएं तेज हैं, लेकिन इसकी कीमत देश के आम उपभोक्ताओं को चुकानी पड़ सकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत भारत के सामने कड़ी शर्त रखी है। ट्रंप का साफ कहना है कि भारत को रूस से कच्चे तेल की खरीद तुरंत बंद करनी होगी और अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अमेरिका और वेनेजुएला पर निर्भर होना पड़ेगा। चेतावनी दी गई है कि अगर भारत इस शर्त को नहीं मानता, तो उस पर दोबारा 25 फीसदी टैरिफ लगाया जा सकता है। इस कूटनीतिक दबाव के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर भारत अमेरिकी मांग मान लेता है, तो पेट्रोल और डीजल के दाम कितने बढ़ सकते हैं।

रूस से दूरी बनाना आसान नहीं
भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का करीब 85 फीसदी आयात करता है। बीते कुछ वर्षों में रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है। आंकड़ों के मुताबिक, भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग एक-तिहाई हिस्सा रूस से आता रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस से तेल की खरीद पूरी तरह रोकना भारत के लिए बेहद मुश्किल है, हालांकि अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते इसमें धीरे-धीरे कटौती शुरू हो चुकी है।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस बदलाव का असर रिफाइनरी कंपनियों पर दिखने लगा है। इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) और एचपीसीएल (HPCL) जैसी सरकारी कंपनियां अब वेनेजुएला से तेल मंगाने के विकल्प तलाश रही हैं। वहीं, निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज ने रूस से तेल की खरीद रोकते हुए वेनेजुएला से बड़ी खेप का ऑर्डर दिया है।

अमेरिकी और रूसी तेल में बड़ा तकनीकी अंतर
यह मामला केवल कूटनीति का नहीं, बल्कि रिफाइनरी तकनीक से भी जुड़ा है। ऊर्जा विशेषज्ञों के मुताबिक, तेल सप्लायर बदलना आसान प्रक्रिया नहीं होती। अमेरिका का ‘शेल ऑयल’ हल्का होता है और उसे गैस कंडेनसेट की श्रेणी में रखा जाता है, जबकि रूस का ‘यूराल क्रूड’ भारी होता है और उसमें सल्फर की मात्रा अधिक होती है।

भारत की कई रिफाइनरियां खास तौर पर भारी और सल्फर युक्त रूसी तेल को प्रोसेस करने के लिए डिजाइन की गई हैं। अमेरिकी तेल का इस्तेमाल करने के लिए रिफाइनरियों को अन्य ग्रेड के तेलों के साथ ब्लेंडिंग करनी पड़ेगी, जिससे लागत और तकनीकी जटिलता दोनों बढ़ेंगी। ऐसे में एक सप्लायर से दूसरे पर अचानक निर्भर होना महंगा सौदा साबित हो सकता है।

आम आदमी की जेब पर पड़ेगा असर
आर्थिक दृष्टि से रूस भारत को कच्चे तेल पर भारी छूट देता रहा है। पहले यह डिस्काउंट 7 से 8 डॉलर प्रति बैरल था, जो अब बढ़कर करीब 11 डॉलर तक पहुंच गया है। इसके उलट, अमेरिकी कच्चा तेल भारतीय खरीदारों के लिए कहीं ज्यादा महंगा है। विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर भारत रूसी तेल छोड़कर अमेरिकी तेल अपनाता है, तो रिफाइनरियों को प्रति बैरल कम से कम 7 डॉलर अतिरिक्त चुकाने पड़ सकते हैं।

इसके साथ ही अमेरिका के खाड़ी तट से भारत तक तेल लाने में लगने वाला समय और शिपिंग लागत भी रूस की तुलना में अधिक है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ी हुई लागत का बोझ रिफाइनरी कंपनियां अंततः उपभोक्ताओं पर डाल सकती हैं। इसका सीधा असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ेगा, जिससे आम आदमी की जेब पर अतिरिक्त भार पड़ना तय माना जा रहा है।

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