नई दिल्ली: वक्फ संशोधन कानून 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में तीसरे दिन की सुनवाई के दौरान एक अहम टिप्पणी सामने आई। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलों के दौरान कहा – “इस्लाम तो इस्लाम ही रहेगा चाहे कोई कहीं भी रहे।”
केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वक्फ करने वाले व्यक्ति का प्रैक्टिसिंग मुस्लिम होना जरूरी है, और यह शरिया कानून के अनुरूप है। उन्होंने कहा कि जैसे मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत अधिकार पाने के लिए मुस्लिम होने का घोषणापत्र देना होता है, वैसे ही वक्फ के लिए भी यह शर्त जरूरी है। उन्होंने यह भी बताया कि 2013 में हुए संशोधन में ‘मुसलमान’ शब्द हटाकर ‘कोई भी व्यक्ति’ कर दिया गया था, लेकिन 2025 के संशोधन में यह स्थिति वापस लाई गई है।
मेहता ने स्पष्ट किया कि यदि कोई गैर-मुस्लिम वक्फ संपत्ति में योगदान देना चाहता है, तो वह अब भी ऐसा कर सकता है। कोई हिंदू मस्जिद निर्माण में दान देना चाहे तो ट्रस्ट के माध्यम से यह संभव है।
ट्राइबल इलाकों (शिड्यूल एरिया) में वक्फ की अनुमति नहीं होने के प्रावधान को संवैधानिक रूप से सही ठहराते हुए, मेहता ने कहा कि यह क्षेत्र विशेष संरक्षण के तहत आते हैं और इस पर प्रतिबंध वैध कारणों से लागू है।
उन्होंने यह भी कहा कि वक्फ बोर्ड का मुख्य कार्य धार्मिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक और लेखा जोखा से संबंधित है। इसमें संपत्तियों की देखरेख, ऑडिट और पारदर्शिता सुनिश्चित की जाती है, जो एक धर्मनिरपेक्ष कार्यप्रणाली है। वक्फ बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति को लेकर उन्होंने कहा कि इससे बोर्ड की धार्मिक प्रकृति पर कोई असर नहीं पड़ता।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और जस्टिस ए.जी. मसीह शामिल हैं, इस कानून पर अंतरिम रोक की मांग वाली याचिकाओं पर विचार कर रही है। केंद्र सरकार ने अपना पक्ष रख दिया है और अब याचिकाकर्ता जवाबी बहस कर रहे हैं।
यह मामला देश की धार्मिक और संवैधानिक व्यवस्था के संतुलन से जुड़ा होने के कारण बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।