पटना (चौथी वाणी)। वरिष्ठ पत्रकार Chandan Chaurasia ने कहा है कि Pakistan और Afghanistan के बीच तेज़ हुए सैन्य तनाव ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को एक बार फिर अस्थिरता के मुहाने पर ला खड़ा किया है। सीमा पार हमले, जवाबी कार्रवाई, ड्रोन और हवाई हमलों के दावे हालात को खुले युद्ध जैसी गंभीर स्थिति की ओर धकेल रहे हैं।
चौरसिया के अनुसार, पाकिस्तान का आरोप है कि अफगान धरती से संचालित तत्व उसकी सुरक्षा को चुनौती दे रहे हैं, जबकि अफगान पक्ष इसे अपनी संप्रभुता पर हमला करार देता है। दोनों देशों के बीच अविश्वास का इतिहास लंबा रहा है। विशेषकर Durand Line की वैधता, सीमावर्ती इलाकों में उग्रवाद और रणनीतिक गुटबंदी जैसे मुद्दे वर्षों से तनाव की जड़ रहे हैं। मौजूदा टकराव उसी असंतोष का परिणाम है।
सैन्य ही नहीं, राजनीतिक और वैचारिक टकराव
उन्होंने कहा कि यह संघर्ष केवल सैन्य नहीं, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक भी है। जब दो अस्थिर अर्थव्यवस्थाएं हथियारों की भाषा में संवाद करती हैं, तो इसका बोझ सीमावर्ती नागरिकों, शरणार्थियों और क्षेत्रीय व्यापार पर पड़ता है। सीमा चौकियों, आपूर्ति शृंखलाओं और मानवीय राहत मार्गों पर इसका असर पहले ही दिखाई देने लगा है। यदि समय रहते संयम नहीं बरता गया, तो यह संकट व्यापक क्षेत्रीय अस्थिरता में बदल सकता है।
घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय समीकरण
चौरसिया ने कहा कि अल्पकाल में तनाव और बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब घरेलू राजनीति में सख्त रुख को समर्थन मिलता हो। पाकिस्तान में सुरक्षा प्रतिष्ठान पर आतंकी ढांचे के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई दिखाने का दबाव है, जबकि अफगान नेतृत्व अपनी संप्रभुता और वैधता सिद्ध करने की चुनौती से जूझ रहा है।
दीर्घकाल में इसके तीन बड़े प्रभाव सामने आ सकते हैं—उग्रवादी नेटवर्क का पुनर्संरचन, शरणार्थी संकट और क्षेत्रीय शक्तियों की सक्रिय दखल। Iran, मध्य एशियाई देश, China और पश्चिमी शक्तियां अपने-अपने हितों के अनुरूप भूमिका निभा सकती हैं। दक्षिण एशिया में बढ़ती अस्थिरता India सहित सभी पड़ोसी देशों के लिए चिंता का विषय बनेगी।
समाधान का रास्ता: संवाद ही विकल्प
चंदन चौरसिया ने कहा कि समाधान कठिन अवश्य है, पर असंभव नहीं। इतिहास गवाह है कि तीखे संघर्ष भी अंततः वार्ता की मेज पर सुलझते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि चरणबद्ध युद्धविराम, तटस्थ मध्यस्थ की मौजूदगी और सीमा सुरक्षा पर संयुक्त तंत्र की स्थापना से शुरुआत की जा सकती है।
संभावित रूपरेखा के तहत पहले सीमाई क्षेत्रों में तत्काल सीज़फायर लागू हो, फिर सुरक्षा अधिकारियों के स्तर पर विश्वास-निर्माण बैठकें आयोजित हों और उसके बाद राजनीतिक नेतृत्व के बीच औपचारिक वार्ता हो। संयुक्त निगरानी तंत्र, खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान और उग्रवादी समूहों पर पारदर्शी कार्रवाई विश्वास बहाली के प्रमुख आधार बन सकते हैं।
उन्होंने कहा कि सवाल यह नहीं है कि कौन जीतेगा, बल्कि यह है कि क्या दोनों देश अपने नागरिकों को सुरक्षित और स्थिर भविष्य दे पाएंगे। दक्षिण एशिया को आज सैन्य शक्ति से अधिक राजनीतिक विवेक की आवश्यकता है, क्योंकि स्थायी शांति ही विकास और सुरक्षा की असली राह खोल सकती है।