बिहार: बाबासाहब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय (BRABU) के साइकोलॉजी विभाग ने पहली बार थारू जनजाति पर एक व्यापक मनोवैज्ञानिक अध्ययन की शुरुआत की है। इस ऐतिहासिक पहल में मलेशिया के प्रसिद्ध मोनाश विश्वविद्यालय की शोधकर्ता टीम भी सहयोग करेगी। यह पहली बार है जब बिहार की किसी जनजाति पर अंतरराष्ट्रीय साझेदारी के तहत गहन शैक्षणिक शोध किया जा रहा है।
विभागाध्यक्ष प्रोफेसर गुप्ता के अनुसार, इस अध्ययन का उद्देश्य थारू समुदाय की बौद्धिक क्षमता, आत्म-सम्मान, संवेदनात्मक बुद्धिमत्ता और शैक्षिक स्तर का वैज्ञानिक विश्लेषण करना है। इसके लिए शोध टीम हर गुरुवार को पश्चिम चंपारण के बगहा क्षेत्र में जाकर थारू समाज के लोगों से बातचीत करेगी और उनके सामाजिक व्यवहार, जीवनशैली और शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करेगी।
शोध के तहत थारू समुदाय के 300 लोगों को एक विशेष प्रश्नावली दी जाएगी, जिसमें करीब 50 प्रश्न होंगे। इन सवालों के जरिए यह समझा जाएगा कि थारू समुदाय के लोग अपनी पहचान और समाज को कैसे देखते हैं, साथ ही उनका प्रशासनिक ढांचे और बाहरी समाज के प्रति नजरिया क्या है। साथ ही, आसपास के गैर-जनजातीय लोगों से भी बातचीत की जाएगी ताकि उनके दृष्टिकोण से भी थारू समाज की सामाजिक स्थिति को समझा जा सके।
प्रो. गुप्ता अगले महीने मलेशिया के मोनाश यूनिवर्सिटी का दौरा करेंगे और इस परियोजना की रूपरेखा तथा अब तक की प्रगति साझा करेंगे। इसके बाद मोनाश विश्वविद्यालय की टीम बगहा आएगी और BRABU के साथ मिलकर फील्ड रिसर्च में भाग लेगी।
थारू जनजाति नेपाल और भारत के सीमावर्ती तराई क्षेत्रों में निवास करती है। बिहार के पश्चिम चंपारण जिले में इस समुदाय की आबादी एक लाख से अधिक है। बगहा, रामनगर और गौनाहा प्रखंडों में थारू समाज की प्रमुख उपस्थिति है। बगहा की 25 पंचायतों में से 20 में थारू बहुलता है, और लगभग 25,000 मतदाता इसी समुदाय से आते हैं।
इस अध्ययन के जरिए यह भी जाना जाएगा कि बीते वर्षों में थारू समाज की सामाजिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक स्थिति में क्या परिवर्तन हुए हैं, और क्या इन बदलावों ने उनके आत्म-सम्मान और समाज में उनकी भागीदारी को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया है। यह परियोजना न केवल शैक्षणिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि नीति निर्माण, आदिवासी विकास और सामाजिक समावेशन के क्षेत्र में भी उपयोगी साक्ष्य प्रदान कर सकती है।