यमन की जेल में हत्या के आरोप में फांसी की सजा भुगत रही भारतीय नर्स निमिषा प्रिया को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई हुई। यह याचिका ‘सेव निमिषा प्रिया एक्शन काउंसिल’ नामक संगठन ने दाखिल की थी, जिसमें उन्होंने कोर्ट से यमन जाकर मृतक के परिवार से बातचीत की अनुमति मांगी है।
मृतक के परिजनों से समझौते की कोशिश
संगठन का मानना है कि यदि उन्हें यमन जाकर मृतक तलाल अब्दुल मेहदी के परिवार से बात करने की इजाजत मिलती है, तो शायद मामला सुलझ सकता है और निमिषा की फांसी की सजा माफ या कम हो सकती है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे भारत सरकार को इस संबंध में ज्ञापन सौंपें, क्योंकि यह मामला अंतरराष्ट्रीय और कूटनीतिक स्तर का है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार इस पर खुद फैसला लेगी, और अदालत इस पर आदेश नहीं दे सकती।
भारत सरकार की ओर से सधी प्रतिक्रिया
सुनवाई के दौरान भारत सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमनी ने कहा कि सरकार इस मामले में किसी भी प्रकार की जल्दबाज़ी या गलती नहीं चाहती। उनका उद्देश्य है कि निमिषा को सुरक्षित भारत लाया जाए। उन्होंने आश्वासन दिया कि सरकार संवेदनशीलता और पूरी सावधानी के साथ इस मुद्दे को देख रही है।
फांसी पर फिलहाल रोक
याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि निमिषा की फांसी की सजा पर फिलहाल रोक लगी हुई है, और इसके लिए उन्होंने भारत सरकार का आभार जताया। उन्होंने यह भी कहा कि अब उन्हें यमन जाकर समझौते की संभावनाओं पर काम करना है।
हत्या का मामला: कैसे फंसीं निमिषा?
केरल की रहने वाली नर्स निमिषा प्रिया 2008 से यमन में रह रही थीं और वहां उन्होंने एक क्लीनिक शुरू किया था। स्थानीय कानूनों के तहत उन्हें यमनी नागरिक तलाल अब्दुल मेहदी को साझेदार बनाना पड़ा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मेहदी ने निमिषा का शोषण करना शुरू कर दिया, उनका पैसा हड़प लिया और पासपोर्ट भी जब्त कर लिया।
साल 2017 में जब निमिषा ने अपना पासपोर्ट वापस पाने की कोशिश की, तो उन्होंने मेहदी को बेहोश करने के लिए इंजेक्शन दिया, लेकिन इस प्रक्रिया में मेहदी की मौत हो गई। इसी के चलते निमिषा को यमन की अदालत ने मौत की सजा सुनाई।
अब इस मामले की अगली सुनवाई 16 अगस्त को होगी, जिसमें कोर्ट यह देखेगा कि सरकार और याचिकाकर्ता के बीच आगे क्या कदम उठाए गए हैं।