भोजशाला विवाद पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, मुस्लिम पक्ष ने हाई कोर्ट के फैसले को दी चुनौती

Bhojshala Dispute Reaches Supreme Court; Muslim Side Challenges High Court Verdict

नई दिल्ली: मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर को हिंदू मंदिर मानने और हिंदू समुदाय को विशेष पूजा अधिकार देने वाले मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, काजी मोइनुद्दीन की ओर से विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की गई है। यह मामला डायरी नंबर 32281/2026 के रूप में दर्ज है और फिलहाल लंबित है।

याचिका में हाई कोर्ट की इंदौर पीठ के 15 मई को दिए गए उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को राजा भोज की संपत्ति और हिंदू मंदिर माना गया था। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने कहा था कि हिंदू समुदाय का पूजा का अधिकार कभी समाप्त नहीं हुआ।

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा था कि 7 अप्रैल 2003 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा बनाई गई नमाज संबंधी व्यवस्था स्थल के मूल स्वरूप के अनुरूप नहीं थी। कोर्ट ने हिंदू पक्ष को पूजा का अधिकार देते हुए मुस्लिम समुदाय के लिए अलग स्थान पर मस्जिद निर्माण हेतु वैकल्पिक जमीन उपलब्ध कराने पर विचार करने की बात कही थी।

हाई कोर्ट ने 2024 में हुए पुरातात्विक सर्वेक्षण का भी उल्लेख किया, जिसमें संस्कृत शिलालेख, हवन कुंड और हिंदू मंदिर वास्तुकला से जुड़े कई प्रमाण मिलने का दावा किया गया था। फैसले के बाद एएसआई ने 16 मई 2026 को नया आदेश जारी कर हिंदू समुदाय को भोजशाला परिसर में पूजा और मां सरस्वती से जुड़े अध्ययन कार्यों के लिए निर्बाध प्रवेश की अनुमति दी थी। हालांकि, संरक्षित स्मारक होने के कारण परिसर का प्रशासनिक नियंत्रण एएसआई के पास ही रहेगा।

अदालत ने केंद्र सरकार को यह प्रयास करने का निर्देश भी दिया था कि ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां सरस्वती की प्राचीन प्रतिमा को भारत वापस लाया जाए। वहीं, हिंदू पक्ष ने भी सुप्रीम कोर्ट में कैविएट याचिका दाखिल कर मांग की है कि हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर किसी भी याचिका पर उनका पक्ष सुने बिना कोई अंतरिम आदेश पारित न किया जाए। यह कैविएट याचिका जितेंद्र सिंह विशेन की ओर से दाखिल की गई है।

गौरतलब है कि भोजशाला विवाद मध्य भारत के सबसे संवेदनशील धार्मिक और ऐतिहासिक मामलों में से एक माना जाता है। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह स्थल 1034 ईस्वी में राजा भोज द्वारा मां सरस्वती के मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र के रूप में स्थापित किया गया था, जबकि मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यहां सदियों से कमाल मौला मस्जिद मौजूद है और पूर्व प्रशासनिक व्यवस्थाओं के तहत इस स्थल की कानूनी स्थिति पहले ही तय की जा चुकी है।

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