पटना : बिहार में लागू पूर्ण शराबबंदी कानून को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। हाल ही में सामने आए सर्वे और सरकारी आंकड़ों ने संकेत दिया है कि राज्य में शराबबंदी के बावजूद नशे से जुड़ी चुनौतियां पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। इसके साथ ही मादक पदार्थों (ड्रग्स) से जुड़े मामलों में भी बढ़ोतरी ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के आंकड़ों के अनुसार, शराब के सेवन में पहले की तुलना में कमी दर्ज की गई है। सरकार इसे शराबबंदी कानून की सफलता के रूप में पेश कर रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लंबे समय से दावा करते रहे हैं कि शराबबंदी ने लाखों परिवारों के सामाजिक और आर्थिक जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डाला है।
हालांकि दूसरी ओर, नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों में बढ़ोतरी के आंकड़े नई चुनौती की ओर इशारा कर रहे हैं। कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा एनडीपीएस (NDPS) एक्ट के तहत दर्ज मामलों में वृद्धि देखी गई है। इससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या शराबबंदी के बाद कुछ लोग दूसरे नशीले पदार्थों की ओर रुख कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि शराबबंदी के प्रभाव का आकलन केवल शराब सेवन के आंकड़ों से नहीं किया जा सकता। इसके लिए समाज में नशे की कुल स्थिति, अवैध तस्करी, नशीले पदार्थों की उपलब्धता और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को लेकर राज्य सरकार पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि शराबबंदी के बावजूद अवैध शराब और मादक पदार्थों का कारोबार पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका है। वहीं सरकार का दावा है कि कानून के उल्लंघन के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है और नशे के नेटवर्क को तोड़ने के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं।
बिहार में शराबबंदी को सामाजिक सुधार के बड़े कदम के रूप में देखा जाता है, लेकिन हालिया आंकड़ों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नशे के खिलाफ लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। सरकार और एजेंसियों के सामने अब चुनौती केवल शराब पर रोक लगाने की नहीं, बल्कि हर प्रकार के नशे पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने की भी है।