50 साल से बाढ़ की मार, करोड़ों खर्च फिर भी बेबस बिहार

Decades of flood devastation, crores spent—yet Bihar remains helpless.

पटना : बिहार में बाढ़ कोई नई समस्या नहीं है। राज्य के बड़े हिस्से में हर साल बाढ़ का खतरा बना रहता है। नदियों का बढ़ता जलस्तर, नेपाल से आने वाला पानी, लगातार बारिश और नदी के बदलते रास्ते इसकी प्रमुख वजहों में शामिल हैं। पिछले करीब 50 वर्षों में बाढ़ से निपटने के लिए सरकारों ने बड़ी रकम खर्च की, लेकिन इसके बावजूद बाढ़ की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी।

बिहार में बाढ़ इतनी गंभीर क्यों है?

बिहार की भौगोलिक स्थिति इसे बाढ़ के लिहाज से बेहद संवेदनशील बनाती है। राज्य की कई प्रमुख नदियां हिमालय और नेपाल के क्षेत्रों से होकर बिहार में प्रवेश करती हैं। भारी बारिश के दौरान इन नदियों में पानी बढ़ने पर इसका सीधा असर बिहार के मैदानी इलाकों पर पड़ता है।

इसके अलावा राज्य का बड़ा हिस्सा समतल है। ऐसे में पानी की निकासी में समय लगता है और लंबे समय तक कई इलाकों में जलजमाव की स्थिति बनी रहती है।

50 वर्षों से जारी है बाढ़ की चुनौती

पिछले पांच दशकों में बिहार ने कई बड़ी बाढ़ों का सामना किया है। बाढ़ के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ता है। खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी इसका सीधा असर पड़ता है।

बाढ़ के कारण फसलें बर्बाद होने के साथ सड़क, पुल, बिजली और दूसरी आधारभूत संरचनाओं को भी नुकसान पहुंचता है।

बाढ़ नियंत्रण पर खर्च होते रहे करोड़ों रुपये

बिहार में बाढ़ से बचाव के लिए दशकों से तटबंध, बांध, नहर, जल निकासी व्यवस्था और अन्य बाढ़ नियंत्रण परियोजनाओं पर काम किया जाता रहा है। सरकार की ओर से हर साल बाढ़ से पहले संवेदनशील क्षेत्रों में तटबंधों की मरम्मत और निगरानी भी की जाती है।

इसके बावजूद बाढ़ का स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। यही वजह है कि हर साल बाढ़ का मौसम आते ही सरकार और प्रशासन के सामने राहत एवं बचाव की बड़ी चुनौती खड़ी हो जाती है।

तटबंधों के बावजूद क्यों नहीं रुकती बाढ़?

तटबंधों का उद्देश्य नदी के पानी को आबादी वाले इलाकों में फैलने से रोकना है। लेकिन अत्यधिक बारिश या नदी में अचानक पानी बढ़ने की स्थिति में तटबंधों पर दबाव बढ़ जाता है।

कई बार नदी के भीतर गाद जमा होने से उसकी जलधारण क्षमता भी प्रभावित होती है। नदी का रास्ता बदलना और आसपास के इलाकों में जलनिकासी की समस्या भी बाढ़ की स्थिति को गंभीर बना सकती है।

नेपाल से आने वाला पानी भी बड़ी चुनौती

बिहार की बाढ़ की चर्चा में नेपाल का उल्लेख अक्सर होता है। राज्य की कई महत्वपूर्ण नदियों का जलग्रहण क्षेत्र नेपाल में है। वहां भारी बारिश होने पर नदियों में पानी का प्रवाह बढ़ जाता है और उसका असर बिहार के सीमावर्ती तथा मैदानी क्षेत्रों में दिखाई देता है।

इसलिए बिहार में बाढ़ प्रबंधन केवल राज्य के स्तर पर नहीं, बल्कि नेपाल के साथ बेहतर समन्वय से भी जुड़ा विषय है।

बाढ़ से सिर्फ घर नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था प्रभावित

बाढ़ आने पर सबसे पहले ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होती है। खेतों में पानी भरने से फसल को नुकसान होता है और पशुओं के लिए चारे की समस्या पैदा होती है।

सड़कों और पुलों के क्षतिग्रस्त होने से आवागमन प्रभावित होता है। कई जगहों पर स्कूल और स्वास्थ्य सेवाएं भी प्रभावित होती हैं। इस तरह बाढ़ का असर केवल पानी भरने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है।

हर साल राहत और बचाव पर बढ़ता दबाव

बाढ़ के दौरान प्रशासन को प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने, भोजन-पानी उपलब्ध कराने और स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के लिए बड़े स्तर पर काम करना पड़ता है।

बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी राहत की जरूरत खत्म नहीं होती। घरों, सड़कों और खेतों को हुए नुकसान की भरपाई तथा प्रभावित परिवारों को दोबारा सामान्य जीवन में लौटाना भी बड़ी चुनौती होती है।

आखिर स्थायी समाधान क्यों जरूरी?

पिछले पांच दशकों के अनुभव से साफ है कि केवल बाढ़ आने के बाद राहत देने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। इसके लिए नदी प्रबंधन, जल निकासी, तटबंधों के रखरखाव, बाढ़ पूर्व चेतावनी और वैज्ञानिक तरीके से जल प्रबंधन पर लगातार काम करना जरूरी है।

बिहार के लिए चुनौती यह है कि बाढ़ से बचाव के लिए किए जा रहे खर्च को केवल तत्काल राहत तक सीमित रखने के बजाय दीर्घकालिक और टिकाऊ बाढ़ प्रबंधन की दिशा में भी इस्तेमाल किया जाए।

बिहार की बाढ़ की कहानी करीब पांच दशक पुरानी है। सरकारों ने बाढ़ नियंत्रण के लिए लगातार योजनाएं बनाईं और बड़ी रकम खर्च की, लेकिन राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों और नदियों की प्रकृति के कारण समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी। 

इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हर साल बिहार क्यों डूबता है, बल्कि यह भी है कि आने वाले वर्षों में बाढ़ के नुकसान को न्यूनतम करने के लिए कितना प्रभावी और दीर्घकालिक मॉडल तैयार किया जाता है।

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