नई दिल्ली : रूस को बड़ा झटका! भारत-चीन की घटती मांग से सस्ता हुआ रूसी तेल, बढ़ी कमाई की चिंता, एशियाई खरीदारों के पीछे हटने से दबाव में आया रूसी कच्चा तेल, ब्रेंट के मुकाबले फिर डिस्काउंट पर पहुंचा
रूस के लिए कच्चे तेल के कारोबार से जुड़ी एक बड़ी चिंता सामने आई है। भारत और चीन जैसे उसके सबसे बड़े खरीदारों की मांग में कमी आने के बाद रूसी यूराल्स (Urals) क्रूड की कीमतों पर दबाव बढ़ गया है। हालात ऐसे बन गए हैं कि जो तेल कुछ समय पहले ब्रेंट क्रूड के मुकाबले प्रीमियम पर बिक रहा था, वह अब फिर से डिस्काउंट पर पहुंच गया है।
बाजार सूत्रों के अनुसार, जुलाई और अगस्त डिलीवरी के लिए रूसी यूराल्स क्रूड भारत और चीन में ब्रेंट के मुकाबले 2 से 3 डॉलर प्रति बैरल के डिस्काउंट पर कारोबार कर रहा है। जबकि अप्रैल और मई में यही तेल 7 से 8 डॉलर प्रति बैरल के प्रीमियम पर बिक रहा था।
भारत और चीन की मांग क्यों घटी?
रिपोर्ट के मुताबिक, एशियाई रिफाइनरियों ने पिछले महीनों में बड़ी मात्रा में तेल का भंडारण कर लिया था। अब वे इन स्टॉक्स का इस्तेमाल कर रही हैं, जिसके चलते नई खरीदारी कम हो गई है। चीन में कई स्वतंत्र रिफाइनरियां कमजोर मुनाफे के कारण उत्पादन घटा रही हैं, जबकि कुछ खरीदारों ने रूसी तेल की नई खेप लेने से भी इनकार कर दिया है।
चीन के कच्चे तेल आयात में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। मई 2026 में देश का तेल आयात आठ वर्षों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया, जिससे वैश्विक बाजार में मांग को लेकर चिंता बढ़ गई है।
रूस की कमाई पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि डिस्काउंट का यह दौर लंबा चला तो रूस की तेल निर्यात से होने वाली आय प्रभावित हो सकती है। रूस पहले ही उत्पादन में गिरावट और ऊर्जा ढांचे पर हमलों जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में प्रमुख खरीदार देशों की कमजोर मांग उसके लिए नई परेशानी बन सकती है।
वैश्विक तेल बाजार पर भी नजर
दूसरी ओर, वैश्विक तेल बाजार में मांग और आपूर्ति दोनों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने 2026 में तेल की वैश्विक मांग घटने की आशंका जताई है। ऊंची कीमतों, कमजोर आर्थिक गतिविधियों और ऊर्जा बचत उपायों का असर खपत पर पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत और चीन जैसे बड़े खरीदारों की खरीदारी में बदलाव का असर सिर्फ रूस ही नहीं, बल्कि पूरे वैश्विक तेल बाजार पर पड़ सकता है। आने वाले महीनों में मांग और कीमतों का रुख तेल उत्पादक देशों के लिए बेहद अहम रहने वाला है।