पटना: पटना हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई करते समय न्यायाधीशों को न्यायिक संवेदनशीलता के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों और निर्धारित दिशा-निर्देशों का भी अध्ययन करना चाहिए।
क्या था पटना हाईकोर्ट का फैसला?
पटना हाईकोर्ट ने 9 जुलाई को दिए गए एक फैसले में कहा था कि किसी महिला की सलवार उतारने का प्रयास करना और उसकी छाती दबाना, उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर हर मामले में दुष्कर्म के प्रयास (Attempt to Rape) की श्रेणी में नहीं आता। अदालत ने माना कि ऐसा कृत्य महिला की लज्जा भंग (Outraging Modesty) के अपराध के अंतर्गत आता है। इसी आधार पर रेप के प्रयास के आरोप में दोषसिद्धि को आंशिक रूप से निरस्त किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पटना हाईकोर्ट के फैसले का भी उल्लेख किया। इस पर भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायाधीशों की जिम्मेदारी है कि वे ऐसे मामलों में पहले से मौजूद प्रासंगिक फैसलों और दिशा-निर्देशों का अध्ययन करें। अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों को संवेदनशील मामलों में उचित कानूनी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
न्यायिक संवेदनशीलता पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA) द्वारा तैयार हैंडबुक और समिति की रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट तथा सभी हाईकोर्ट की वेबसाइटों पर उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। साथ ही राज्यों से कहा गया है कि पुलिस एफआईआर दर्ज करने और चार्जशीट दाखिल करने के दौरान इन दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करे।
2008 की घटना से जुड़ा है मामला
पटना हाईकोर्ट का यह फैसला वर्ष 2008 की एक घटना से जुड़ा है। आरोप था कि एक फोटो स्टूडियो संचालक ने युवती को स्टूडियो के अंदर रोककर उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दुष्कर्म के प्रयास और अन्य धाराओं में दोषी ठहराया था। बाद में हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए रेप के प्रयास की सजा को निरस्त किया, जबकि महिला की लज्जा भंग से संबंधित अपराध को बरकरार रखा।
मामले पर बढ़ी कानूनी बहस
पटना हाईकोर्ट के फैसले और उस पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक व्याख्या और न्यायिक संवेदनशीलता को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। अब इस मामले को कानून और न्यायिक प्रक्रिया के व्यापक संदर्भ में भी देखा जा रहा है।