जगन्नाथ रथ यात्रा से मिलता है मोक्ष
हिंदू धर्म में जगन्नाथ रथ यात्रा एक अत्यंत पवित्र और धार्मिक उत्सव माना जाता है। इसकी तैयारियां महीनों पहले से शुरू हो जाती हैं। यह भव्य यात्रा ओडिशा के पुरी शहर में होती है, जिसमें भाग लेने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु जुटते हैं। मान्यता है कि इस यात्रा में सम्मिलित होकर भक्त जीवन के बंधनों से मुक्त होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति करते हैं।
आज भी निभाई जाती हैं सदियों पुरानी परंपराएं
पुरी की रथ यात्रा में आज भी कई ऐसी परंपराएं निभाई जाती हैं जो प्राचीन काल से चली आ रही हैं। इनमें भगवान के रथों का विशेष निर्माण, यात्रा से पहले भगवान का बीमार होना, फिर ठीक होकर नगर भ्रमण पर निकलना और सोने की झाड़ू से मार्ग की सफाई जैसी परंपराएं शामिल हैं। यह पूरी यात्रा लगभग 10 दिनों तक चलती है।
गुंडिचा मंदिर में करते हैं विश्राम
रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ नगर भ्रमण पर निकलते हैं। इस दौरान वे तीन किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर में जाकर सात दिनों तक विश्राम करते हैं। इसके बाद वे वापस मुख्य मंदिर लौटते हैं।
गुंडिचा मंदिर में क्यों रुकते हैं भगवान जगन्नाथ?
गुंडिचा मंदिर, जो कि कलिंग स्थापत्य शैली में निर्मित है, भगवान जगन्नाथ के ननिहाल यानी मौसी के घर के रूप में जाना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, गुंडिचा देवी भगवान जगन्नाथ की मौसी थीं। रथ यात्रा के दौरान भगवान अपने भाई और बहन के साथ मौसी के घर सात दिन के लिए विश्राम करने जाते हैं।
मौसी करती हैं विशेष स्वागत
गुंडिचा मंदिर में भगवान जगन्नाथ और उनके भाई-बहन का विशेष स्वागत किया जाता है। उन्हें उनकी पसंदीदा डिश ‘पादोपीठा’ समेत कई पकवान परोसे जाते हैं। यह परंपरा सदियों से निभाई जा रही है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन सात दिनों में भगवान अपनी मौसी के घर समय बिताते हैं, आराम करते हैं और भक्तों को दर्शन देते हैं। इसके बाद वे पुनः अपने मूल स्थान श्रीमंदिर (जगन्नाथ मंदिर) लौट जाते हैं।