नई दिल्ली: राज्यसभा में बुधवार को एक बेहद संवेदनशील और मानवीय मुद्दा उठाया गया। भाजपा सांसद राधा मोहनदास अग्रवाल ने सुझाव दिया कि विदेश जाने वाले युवाओं से एक शपथपत्र (एफिडेविट) लिया जाए, जिसमें वे अपने माता-पिता की देखभाल, स्वास्थ्य बीमा और नियमित संपर्क बनाए रखने का वचन दें।
सदन में बोलते हुए अग्रवाल ने कहा कि देश के लगभग साढ़े तीन करोड़ लोग विदेशों में रह रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनके माता-पिता भारत में रहते हैं। उन्होंने कहा कि कई माता-पिता अपने बच्चों को विदेश भेजने के लिए अपनी जमीन-जायदाद तक बेच देते हैं और अपना सुख त्याग देते हैं। कई मामलों में सरकारी सस्ती शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का भी योगदान होता है, जिससे बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर विदेश जाते हैं।
भाजपा सांसद ने चिंता जताई कि हाल के दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां विदेश में रह रहे बच्चों ने अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल नहीं की। उन्होंने इंदौर और दिल्ली की घटनाओं का जिक्र करते हुए बताया कि कुछ मामलों में माता-पिता की मृत्यु के बाद भी उनके बच्चे अंतिम समय में साथ नहीं थे। आंकड़ों के अनुसार, देश में ऐसे करीब 500 मामले सामने आए हैं, जहां विदेश में रह रहे बच्चों ने अपने माता-पिता की सुध नहीं ली।
अग्रवाल ने कहा कि ‘मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन एक्ट, 2007’ प्रभावी तरीके से लागू नहीं हो पा रहा है। उनके अनुसार, यह कानून लगभग ‘दंतहीन’ साबित हो रहा है, क्योंकि माता-पिता को स्वयं न्यायालय जाना पड़ता है।
उन्होंने प्रस्ताव रखा कि विदेश जाने वाले लोगों से यह लिखित आश्वासन लिया जाए कि वे अपनी आय का एक निश्चित हिस्सा माता-पिता की देखभाल पर खर्च करेंगे, उनके लिए केयरटेकर की व्यवस्था करेंगे, स्वास्थ्य बीमा कराएंगे और कम से कम सप्ताह में एक बार फोन पर बात करेंगे।
इसके साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि हर छह महीने में ‘ऑब्लिगेशन सर्टिफिकेट’ लिया जाए। यदि कोई व्यक्ति इस दायित्व का पालन नहीं करता है, तो भारत सरकार को उसका पासपोर्ट निरस्त करने और उसे वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिए।
अग्रवाल ने सभापति के माध्यम से विदेश मंत्री से इस विषय पर गंभीरता से विचार करने का आग्रह किया, ताकि देश के वरिष्ठ नागरिकों को अकेलेपन और उपेक्षा का सामना न करना पड़े।