‘मैं वापस आऊंगा’ से ताजा हुई बंटवारे की दर्दभरी दास्तान, प्रीतम और भगवान की मोहब्बत बनी मिसाल

'main wapas aaunga' revives the painful saga of Partition; the love story of Pritam and Bhagwan becomes an inspiring example.

मुंबई: निर्देशक इम्तियाज अली की फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ इन दिनों दर्शकों के दिलों को छू रही है। भारत-पाकिस्तान विभाजन की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म प्यार, बिछड़न और उम्मीद की ऐसी कहानी बयां करती है, जिसने लोगों को भावुक कर दिया है। फिल्म में दिखाया गया दर्द केवल कल्पना नहीं, बल्कि उन लाखों परिवारों की याद दिलाता है जो 1947 के बंटवारे में बिछड़ गए थे।

इसी संदर्भ में एक ऐसी वास्तविक प्रेम कहानी भी सामने आती है, जो समय और सरहदों की तमाम बाधाओं के बावजूद अमर हो गई। यह कहानी है प्रीतम कौर और भगवान सिंह की, जिनकी जिंदगी को बंटवारे ने अचानक बदल दिया था। दोनों की सगाई हो चुकी थी और वे साथ भविष्य के सपने देख रहे थे, लेकिन देश के विभाजन ने उन्हें एक-दूसरे से दूर कर दिया।

1947 में हालात बिगड़ने के बाद प्रीतम कौर को उनके परिवार ने सुरक्षा के लिए पाकिस्तान के गुजरांवाला से अमृतसर भेज दिया। दूसरी ओर भगवान सिंह भी सांप्रदायिक हिंसा और दंगों के बीच अपने परिवार से बिछड़ गए। हालात इतने खराब थे कि दोनों को लगने लगा कि शायद अब उनकी मुलाकात कभी नहीं हो पाएगी।

भगवान सिंह ने दंगों में अपने करीबी परिजनों को खो दिया था और जान बचाकर अमृतसर पहुंचे थे। वहीं प्रीतम भी शरणार्थी जीवन की कठिनाइयों से गुजर रही थीं। दोनों एक ही शहर में मौजूद थे, लेकिन उन्हें एक-दूसरे की कोई खबर नहीं थी।

कहानी ने भावुक मोड़ तब लिया, जब अमृतसर के एक शरणार्थी शिविर में अचानक दोनों आमने-सामने आ गए। वर्षों की बेचैनी और दर्द उस एक पल में आंखों के आंसुओं में बदल गया। लंबे इंतजार के बाद दोनों ने मार्च 1948 में विवाह कर लिया और अपनी अधूरी प्रेम कहानी को नया मुकाम दिया।

बताया जाता है कि शादी के दिन प्रीतम ने वही फुलकारी जैकेट पहनी थी, जिसे वह बंटवारे के दौरान अपने साथ लाई थीं। वहीं भगवान सिंह का पुराना ब्रीफकेस भी उनकी यादों का अहम हिस्सा बना रहा। आज ये दोनों वस्तुएं अमृतसर के पार्टिशन म्यूजियम में सुरक्षित रखी गई हैं, जो उनके प्रेम और संघर्ष की गवाही देती हैं।

‘मैं वापस आऊंगा’ जैसी फिल्में केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि इतिहास के उन अनकहे अध्यायों को भी सामने लाती हैं, जिनमें दर्द, विस्थापन और इंसानी रिश्तों की गहराई छिपी हुई है। प्रीतम और भगवान की कहानी भी यही संदेश देती है कि सच्चा प्यार परिस्थितियों से हार नहीं मानता और समय की सबसे कठिन परीक्षाओं को भी पार कर सकता है।

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