नई दिल्ली: Supreme Court of India ने अदालती कार्यवाही और याचिकाएं तैयार करने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते और गैर-जिम्मेदाराना इस्तेमाल पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। हाल के दिनों में अदालत के सामने ऐसे कई मामले आए, जिनमें वकीलों ने एआई टूल्स की मदद से याचिकाएं तैयार कीं और उनमें ऐसे फैसलों व उद्धरणों का हवाला दे दिया, जिनका वास्तविकता में कोई अस्तित्व ही नहीं है। शीर्ष अदालत ने इस तरह की भ्रामक और फर्जी जानकारी पर कड़ा ऐतराज जताया है।
हिमंता बिस्वा मामले की सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणी
यह टिप्पणी चीफ जस्टिस Surya Kant, न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi और न्यायमूर्ति B. V. Nagarathna की पीठ ने ‘हिमंता बिस्वा’ मामले की सुनवाई के दौरान की। पीठ ने कहा कि कुछ वकील बिना तथ्यों की जांच या क्रॉस-वेरिफिकेशन किए एआई टूल्स पर आंख मूंदकर भरोसा कर रहे हैं। इससे अदालत में गलत और भ्रामक जानकारियां पेश हो रही हैं, जो न्याय प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए खतरा बन सकती हैं।
अदालत में पेश हुआ ‘दया बनाम मानवता’ का काल्पनिक फैसला
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति नागरत्ना ने एक चौंकाने वाला उदाहरण साझा किया। उन्होंने बताया कि अदालत में ‘दया बनाम मानवता’ नामक एक ऐसे कथित फैसले का हवाला दिया गया, जो पूरी तरह से मनगढ़ंत था और कानूनी रिकॉर्ड में उसका कोई उल्लेख नहीं है।
पीठ ने यह भी कहा कि कई मामलों में वकील वास्तविक निर्णयों का संदर्भ तो देते हैं, लेकिन जिन पैराग्राफ या अंशों को उद्धृत किया जाता है, वे मूल फैसले में मौजूद ही नहीं होते। अदालत ने बताया कि न्यायमूर्ति Dipankar Datta की पीठ के समक्ष भी ऐसा ही मामला सामने आ चुका है, जहां पूर्व उदाहरण पूरी तरह से फर्जी पाए गए थे।
एआई समिट के बीच सख्त संदेश, जल्द जारी होंगे निर्देश
यह सख्त टिप्पणी ऐसे समय आई है जब देश में एआई से जुड़ा एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हो रहा है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका में एआई के दुरुपयोग को रोकने के लिए जल्द ही सभी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को विस्तृत प्रशासनिक दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे।
अदालत ने वकीलों को चेतावनी दी कि तकनीक कानूनी शोध में सहायक हो सकती है, लेकिन अदालत में प्रस्तुत दस्तावेजों की सटीकता और प्रामाणिकता की अंतिम जिम्मेदारी संबंधित वकील की ही होगी।