नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने जून 2026 की मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो रेट को 5.25 फीसदी पर यथावत रखने का फैसला किया है। शुक्रवार को आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता में हुई मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के बाद यह घोषणा की गई। समिति ने लगातार दूसरी बार रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं करते हुए अपनी ‘न्यूट्रल’ नीति को भी बरकरार रखा है।
सर्वसम्मति से लिया गया फैसला
3 से 5 जून तक चली वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी द्विमासिक मौद्रिक नीति बैठक में एमपीसी ने मौजूदा आर्थिक और वित्तीय परिस्थितियों की समीक्षा की। इसके बाद समिति ने सर्वसम्मति से रेपो रेट को 5.25 फीसदी पर स्थिर रखने का निर्णय लिया।
आरबीआई के अनुसार, स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (SDF) की दर 5 फीसदी पर बनी रहेगी, जबकि मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) और बैंक रेट 5.5 फीसदी पर कायम रहेंगे।
क्या होता है रेपो रेट?
रेपो रेट वह ब्याज दर होती है जिस पर RBI वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक जरूरतों के लिए धन उपलब्ध कराता है। रेपो रेट बढ़ने से होम लोन, वाहन लोन और बिजनेस लोन महंगे हो जाते हैं, जबकि दरों में कमी आने पर कर्ज सस्ता होता है और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है।
वैश्विक चुनौतियों पर RBI की नजर
नीति निर्णय की घोषणा करते हुए गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव, अमेरिका-ईरान संघर्ष, प्रमुख व्यापार मार्गों में व्यवधान, सप्लाई चेन की दिक्कतें और बाजार में बढ़ती अस्थिरता ने आर्थिक माहौल को प्रभावित किया है।
उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर बढ़ी अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत है, जिससे देश बाहरी झटकों का सामना करने की बेहतर स्थिति में है।
चुनौतियों को अवसर में बदलने की जरूरत
आरबीआई गवर्नर ने कहा कि मौजूदा वैश्विक उथल-पुथल केवल चुनौती ही नहीं, बल्कि भारत के लिए अपनी आर्थिक मजबूती और लचीलापन बढ़ाने का अवसर भी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश को इन परिस्थितियों का सामना करने के साथ-साथ अपनी आर्थिक संरचना को और मजबूत बनाने की दिशा में भी काम करना चाहिए।
अप्रैल में भी नहीं बदली थी दरें
गौरतलब है कि अप्रैल 2026 की मौद्रिक नीति समीक्षा में भी एमपीसी ने रेपो रेट को 5.25 फीसदी पर बरकरार रखा था और ‘न्यूट्रल’ रुख जारी रखा था। जून बैठक में भी उसी नीति को आगे बढ़ाया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि रेपो रेट में कोई बदलाव न होने से फिलहाल आम लोगों की EMI पर तत्काल असर नहीं पड़ेगा, जबकि भारतीय रुपये और वित्तीय बाजारों को भी स्थिरता का संदेश मिलेगा।