पटना: बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव अब केवल एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है। इसे मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार की पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा माना जा रहा है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा सदस्य बनने के बाद यह सीट खाली हुई थी, जिस पर 30 जुलाई को मतदान होना है।
प्रशांत किशोर ने मुकाबले को बनाया हाई-प्रोफाइल
जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बांकीपुर से चुनाव लड़ने का ऐलान कर मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना दिया है। उन्होंने इस उपचुनाव को सम्राट चौधरी सरकार के कामकाज पर “जनमत संग्रह” करार देते हुए कहा कि यदि भाजपा यह चुनाव जीतती है तो वह जनता का समर्थन माने जाएंगे, लेकिन यदि भाजपा हारती है तो सरकार को जनता का संदेश समझना चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि उन्होंने आसान सीट की बजाय भाजपा के मजबूत गढ़ को चुनकर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है।
भाजपा के लिए साख बचाने की चुनौती
बांकीपुर सीट पिछले तीन दशकों से भाजपा का मजबूत गढ़ रही है। पहले नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा और बाद में नितिन नवीन लगातार इस सीट पर जीत दर्ज करते रहे हैं। ऐसे में भाजपा के सामने सिर्फ सीट बचाने की नहीं, बल्कि अपने मजबूत जनाधार को बरकरार रखने की चुनौती है। पार्टी का मानना है कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में वह एक बार फिर इस सीट पर जीत दर्ज करेगी।
महागठबंधन और RJD भी पूरी ताकत से मैदान में
इस चुनाव ने महागठबंधन के भीतर भी हलचल बढ़ा दी है। कांग्रेस की दावेदारी के बीच राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने रेखा गुप्ता को उम्मीदवार घोषित कर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। अब भाजपा, जन सुराज और RJD के बीच सीधी राजनीतिक टक्कर देखने को मिलेगी।
बिहार की राजनीति की दिशा तय कर सकता है नतीजा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बांकीपुर उपचुनाव का असर एक सीट तक सीमित नहीं रहेगा। इस चुनाव के नतीजे से सम्राट चौधरी सरकार की लोकप्रियता, भाजपा की शहरी पकड़ और प्रशांत किशोर की नई राजनीतिक ताकत का भी आकलन होगा। यही वजह है कि पूरे बिहार की नजर अब इस हाई-प्रोफाइल मुकाबले पर टिकी हुई है।