नई दिल्ली: भारत की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी ने एक बार फिर अपने चुनिंदा मॉडलों की कीमतों में बढ़ोतरी की घोषणा की है। कंपनी समय-समय पर बाजार की परिस्थितियों, उत्पादन लागत, कच्चे माल की कीमतों और अन्य परिचालन खर्चों को देखते हुए कीमतों में बदलाव करती रहती है। इस बार भी कई लोकप्रिय मॉडलों की एक्स-शोरूम कीमतों में इजाफा किया गया है।
हालांकि कीमतों में बढ़ोतरी हर मॉडल में समान नहीं है। कुछ कारों पर मामूली असर पड़ा है, जबकि कुछ मॉडल पहले की तुलना में अधिक महंगे हो गए हैं। ऐसे में नई कार खरीदने की योजना बना रहे ग्राहकों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कंपनी बार-बार कीमतें क्यों बढ़ा रही है और इसका उनके बजट पर कितना असर पड़ेगा।
किन कारों की कीमतों में हुआ बदलाव?
मारुति सुजुकी ने जिन लोकप्रिय मॉडलों की कीमतों में संशोधन किया है, उनमें हैचबैक, सेडान, एसयूवी और एमपीवी सभी सेगमेंट शामिल हैं। कंपनी के पोर्टफोलियो में शामिल WagonR, Swift, Baleno, Ertiga, Jimny और अन्य कुछ मॉडलों की कीमतों में अलग-अलग स्तर पर बदलाव किया गया है।
कंपनी का कहना है कि हर मॉडल की कीमत उसकी उत्पादन लागत, पार्ट्स की उपलब्धता और बाजार की मांग के आधार पर तय की जाती है। इसलिए सभी वाहनों पर एक जैसी बढ़ोतरी नहीं की गई।
आखिर क्यों बढ़ानी पड़ती हैं कारों की कीमतें?
कार निर्माता कंपनियां केवल मुनाफा बढ़ाने के लिए कीमतें नहीं बढ़ातीं। इसके पीछे कई आर्थिक और औद्योगिक कारण होते हैं।
1. कच्चे माल की बढ़ती कीमत
कार बनाने में स्टील, एल्यूमिनियम, प्लास्टिक, रबर, कॉपर और कई अन्य धातुओं का उपयोग होता है। इनकी कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव आता रहता है। जब इनकी लागत बढ़ती है तो उत्पादन महंगा हो जाता है।
2. इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स की लागत
आज की कारें पहले की तुलना में कहीं ज्यादा तकनीकी हो चुकी हैं। इंफोटेनमेंट सिस्टम, डिजिटल इंस्ट्रूमेंट क्लस्टर, एयरबैग कंट्रोल यूनिट, सेंसर, कैमरा और ECU जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की लागत भी बढ़ी है।
3. लॉजिस्टिक्स खर्च
वाहनों और पार्ट्स को फैक्ट्री से डीलरशिप तक पहुंचाने में ईंधन, ट्रांसपोर्ट और सप्लाई चेन का बड़ा खर्च शामिल होता है। यदि डीजल और परिवहन महंगा होता है तो उसका असर कार की अंतिम कीमत पर भी दिखाई देता है।
4. नए सुरक्षा नियम
भारत में पिछले कुछ वर्षों में वाहन सुरक्षा को लेकर कई नए नियम लागू किए गए हैं। छह एयरबैग, बेहतर क्रैश प्रोटेक्शन, इलेक्ट्रॉनिक स्टेबिलिटी कंट्रोल, रियर सीट बेल्ट रिमाइंडर और अन्य सुरक्षा फीचर्स जोड़ने से निर्माण लागत बढ़ती है।
5. उत्सर्जन मानक
सरकार समय-समय पर प्रदूषण नियंत्रण के लिए नए उत्सर्जन मानक लागू करती है। इंजन और एग्जॉस्ट सिस्टम में बदलाव के कारण कंपनियों की लागत बढ़ जाती है।
ग्राहकों पर क्या पड़ेगा असर?
कीमतों में बढ़ोतरी का सबसे सीधा असर उन ग्राहकों पर पड़ता है जो नई कार खरीदने की तैयारी कर रहे हैं।
यदि किसी कार की कीमत 20 हजार रुपये बढ़ती है तो केवल एक्स-शोरूम कीमत ही नहीं बढ़ती, बल्कि इसके साथ रोड टैक्स, इंश्योरेंस और फाइनेंस की लागत भी बढ़ सकती है।
यदि ग्राहक कार लोन ले रहा है तो EMI में भी हल्की बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
क्या पुरानी बुकिंग पर लागू होगी नई कीमत?
अक्सर कंपनियां कीमत बढ़ाने के बाद यह स्पष्ट करती हैं कि नई कीमतें किन बुकिंग पर लागू होंगी।
यदि किसी ग्राहक ने पहले ही कार बुक कर ली है तो यह डीलरशिप की शर्तों और कंपनी की नीति पर निर्भर करता है कि उसे पुरानी कीमत मिलेगी या नई।
इसी वजह से कार बुक करते समय ग्राहकों को प्राइस प्रोटेक्शन क्लॉज जरूर समझना चाहिए।
मारुति क्यों बनी हुई है नंबर-1?
भारत में मारुति सुजुकी की लोकप्रियता केवल कम कीमत की वजह से नहीं है।
कंपनी की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल सर्विस नेटवर्क, सस्ती मेंटेनेंस, बेहतर माइलेज और मजबूत रीसेल वैल्यू है।
देशभर के छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों तक कंपनी की पहुंच होने के कारण ग्राहक आज भी इसे भरोसेमंद ब्रांड मानते हैं।
क्या अब भी खरीदना फायदेमंद है?
यदि आप अगले कुछ महीनों में कार खरीदने की योजना बना रहे हैं तो केवल कीमत बढ़ने की वजह से फैसला टालना हमेशा सही नहीं होता।
ऑटो उद्योग के जानकारों का मानना है कि यदि भविष्य में भी इनपुट कॉस्ट बढ़ती रही तो कीमतों में आगे भी संशोधन संभव है।
ऐसे में जरूरत होने पर खरीदारी टालने की बजाय उपलब्ध ऑफर्स और फाइनेंस योजनाओं की तुलना करना अधिक समझदारी हो सकती है।
अन्य कंपनियां भी बढ़ा चुकी हैं कीमतें
मारुति अकेली कंपनी नहीं है जिसने कीमतों में बदलाव किया है।
पिछले कुछ वर्षों में Hyundai, Tata Motors, Mahindra, Kia, Toyota, Honda, MG Motor और कई अन्य वाहन निर्माता भी समय-समय पर अपने मॉडलों की कीमतों में संशोधन कर चुके हैं।
इससे साफ है कि यह केवल किसी एक कंपनी का फैसला नहीं बल्कि पूरी ऑटो इंडस्ट्री में बढ़ती लागत का असर है।
सेकेंड हैंड कार बाजार को मिलेगा फायदा?
जब नई कारें महंगी होती हैं तो कई ग्राहक प्री-ओन्ड यानी सेकेंड हैंड कारों की ओर रुख करते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि नई कारों की कीमत बढ़ने से इस्तेमाल की गई अच्छी स्थिति वाली कारों की मांग में भी इजाफा हो सकता है।
इलेक्ट्रिक वाहनों पर क्या असर?
ऑटो उद्योग तेजी से इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर बढ़ रहा है।
हालांकि इलेक्ट्रिक कारों की शुरुआती कीमत अभी भी कई ग्राहकों के लिए चुनौती बनी हुई है।
यदि पेट्रोल और डीजल कारें लगातार महंगी होती हैं तो आने वाले वर्षों में EV की मांग और बढ़ सकती है।
क्या आने वाले महीनों में फिर बढ़ सकते हैं दाम?
बाजार विश्लेषकों का कहना है कि यदि कच्चे माल की कीमत, विदेशी मुद्रा विनिमय दर, लॉजिस्टिक्स लागत और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में बड़ा बदलाव नहीं आता, तब भी कंपनियां समय-समय पर कीमतों की समीक्षा करती रहेंगी।
इसलिए भविष्य में सीमित स्तर पर और प्राइस हाइक से इनकार नहीं किया जा सकता।
कार खरीदने से पहले इन बातों का रखें ध्यान
- अलग-अलग डीलरशिप से कीमत की तुलना करें।
- कंपनी के मौजूदा ऑफर्स जरूर देखें।
- एक्सचेंज बोनस और कॉर्पोरेट डिस्काउंट की जानकारी लें।
- ऑन-रोड कीमत का पूरा ब्रेकअप समझें।
- केवल EMI देखकर फैसला न लें, कुल लागत भी देखें।
- अपनी जरूरत और बजट के अनुसार मॉडल चुनें।
मारुति सुजुकी द्वारा कीमतों में किया गया ताजा संशोधन भारतीय ऑटो उद्योग में बढ़ती लागत और बदलती आर्थिक परिस्थितियों का संकेत है। उत्पादन खर्च, सुरक्षा मानकों, तकनीकी अपग्रेड और सप्लाई चेन की लागत लगातार बढ़ रही है, जिसका असर वाहन निर्माताओं के मूल्य निर्धारण पर पड़ रहा है।
ग्राहकों के लिए यह जरूरी है कि वे केवल कीमत पर नहीं बल्कि वाहन की कुल उपयोगिता, सुरक्षा, माइलेज, सर्विस नेटवर्क और लंबी अवधि की मेंटेनेंस लागत को भी ध्यान में रखें। यदि आपकी कार खरीदने की योजना पहले से तय है, तो उपलब्ध ऑफर्स और फाइनेंस विकल्पों की तुलना कर सही समय पर निर्णय लेना अधिक लाभदायक हो सकता है। आने वाले समय में ऑटो सेक्टर में प्रतिस्पर्धा और नई तकनीकों के साथ कीमतों में बदलाव का सिलसिला जारी रहने की संभावना बनी रहेगी।