पटना: जब मुंगेर के ग्रामीणों की फरियाद जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने नहीं सुनी, तो उन्होंने खुद ही सड़क बनाने का जिम्मा उठा लिया। गांव के करीब 300 लोगों ने मिलकर अपनी मेहनत से ऊबड़-खाबड़ और जर्जर सड़क को सुधारने के लिए श्रमदान किया। यह कदम ग्रामीणों ने इसलिए उठाया क्योंकि इस रास्ते पर लगातार सड़क हादसे हो रहे थे, जिनमें वाहन नदी में गिर जाते थे, और फिर ग्रामीणों को कई घंटों की मेहनत के बाद गाड़ी को बाहर निकालना पड़ता था।
डीएम और जनप्रतिनिधियों से की गई अपील का कोई असर नहीं हुआ
ग्रामीणों का कहना है कि मुंगेर के तत्कालीन डीएम, नवीन कुमार को भी इस समस्या से अवगत कराया गया था, जब वह एक कार्यक्रम में आए थे, लेकिन उनके द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसके अलावा, जनप्रतिनिधियों से भी कई बार मदद मांगी गई, लेकिन उन्होंने भी इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया।
बिहार सरकार की सड़कों की स्थिति और धरहरा प्रखंड की समस्या
बिहार सरकार राज्यभर में सड़कों के निर्माण और मरम्मत पर लगातार काम कर रही है, लेकिन मुंगेर जिले के धरहरा प्रखंड की सड़कों की हालत बेहद खराब है। विशेष रूप से नक्सल प्रभावित बंगलवा पंचायत के सराधी गांव की सड़क, जो करैली और कैथवन को जोड़ती है, लंबे समय से जर्जर हालत में है। यहां आए दिन दुर्घटनाएं होती रहती हैं। सड़क की ऊबड़-खाबड़ स्थिति के कारण बारिश के मौसम में यहां पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है।
जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की उपेक्षा
ग्रामीणों ने पहले अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से इस सड़क के निर्माण की मांग की थी, लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं सुनी। न तो अधिकारियों ने इस पर ध्यान दिया और न ही जनप्रतिनिधियों ने कोई कार्रवाई की। इस निराशा के बाद, ग्रामीणों ने खुद सड़क की मरम्मत करने का निर्णय लिया।
ग्रामीणों ने श्रमदान से सड़क की स्थिति सुधार दी
करीब 300 ग्रामीणों ने मिलकर श्रमदान किया और सराधी से करैली गांव जाने वाली सड़क और पुलिया के आसपास मिट्टी भराई कर रास्ते को सुगम बनाया। आसपास के अन्य गांवों के ग्रामीणों ने भी इस श्रमदान में अपनी सक्रिय भागीदारी दिखाई।
सरकार और जनप्रतिनिधियों की लापरवाही
ग्रामीणों का कहना है कि इस सड़क की मरम्मत के लिए पूर्व ग्रामीण कार्य विभाग के मंत्री शैलेश कुमार और कांग्रेस विधायक डॉ. अजय कुमार सिंह समेत अन्य जनप्रतिनिधि और अधिकारी खोपावर गांव पहुंचे थे। उस समय ग्रामीणों ने इन सभी को सड़क और पुलिया की जर्जर स्थिति से अवगत कराया था, लेकिन किसी ने भी इस समस्या का समाधान नहीं किया।
सड़क का कायाकल्प, जनप्रतिनिधियों की लापरवाही की निशानी
ग्रामीणों ने मिलकर सड़क को सुधारने के बाद एक संदेश दिया कि अगर जनप्रतिनिधि और सरकारी अधिकारी अपनी जिम्मेदारी निभाते तो इस स्थिति से बचा जा सकता था। उनके इस श्रमदान से यह साफ होता है कि सरकार की कुव्यवस्था और जनप्रतिनिधियों की लापरवाही के कारण आम लोग अपने हक के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं।