नई दिल्ली: ब्रिक्स देशों का डिजिटल पेमेंट प्लान: डॉलर वर्चस्व को सीधी चुनौती

New Delhi: BRICS countries' digital payment plan: A direct challenge to dollar dominance.

नई दिल्ली। वैश्विक मंच पर ब्रिक्स देशों की बढ़ती एकजुटता लंबे समय से अमेरिका के लिए चिंता का कारण रही है। भारत, रूस और चीन जैसे प्रभावशाली देशों के नेतृत्व वाले इस समूह पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले भी तीखी टिप्पणियां कर चुके हैं। इसकी बड़ी वजह ब्रिक्स का अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने की दिशा में बढ़ता कदम है। अब ब्रिक्स देश एक ऐसे साझा डिजिटल पेमेंट सिस्टम की तैयारी कर रहे हैं, जो डॉलर आधारित वैश्विक भुगतान व्यवस्था को सीधी चुनौती दे सकता है।

सूत्रों के मुताबिक, ब्रिक्स देश एक साझा डिजिटल पेमेंट प्लेटफॉर्म विकसित करने पर काम कर रहे हैं। इस प्रणाली के तहत भारत, चीन और रूस की सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) को आपस में जोड़ा जाएगा, ताकि सदस्य देशों के बीच व्यापार सीधे उनकी अपनी डिजिटल मुद्राओं में किया जा सके।

नई मुद्रा नहीं, साझा प्लेटफॉर्म पर जोर
हाल के महीनों में ब्रिक्स की साझा मुद्रा को लेकर कई अटकलें लगाई जा रही थीं। हालांकि अब यह स्पष्ट हो गया है कि समूह किसी नई करेंसी को लॉन्च करने के बजाय एक साझा डिजिटल भुगतान प्रणाली पर फोकस कर रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य डॉलर आधारित भुगतान प्रणाली और स्विफ्ट जैसे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क पर निर्भरता कम करना है। गौरतलब है कि इस साल ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी भारत कर रहा है, जिससे इस पहल को आगे बढ़ाने में भारत की भूमिका और भी अहम मानी जा रही है।

डिजिटल मुद्राओं को जोड़ने की योजना
रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित सिस्टम में भारत की ई-रुपया, चीन की डिजिटल युआन और रूस की डिजिटल रूबल को एक साझा तकनीकी प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाएगा। हालांकि हर देश अपनी डिजिटल मुद्रा पर पूर्ण नियंत्रण बनाए रखेगा। इस व्यवस्था से भुगतान प्रक्रिया अधिक तेज, सरल और कम लागत वाली हो जाएगी। साथ ही, ब्रिक्स देशों को आपसी व्यापार के लिए न डॉलर की जरूरत पड़ेगी और न ही डॉलर आधारित चैनलों पर निर्भर रहना होगा।

भारत की भूमिका क्यों है अहम
भारत इस मॉडल को व्यावहारिक बनाने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। भारत का मानना है कि अलग-अलग मुद्राओं को मिलाने की बजाय भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ना ज्यादा व्यावहारिक और टिकाऊ समाधान है। इसके पीछे भारत का सफल डिजिटल पेमेंट सिस्टम यूपीआई एक मजबूत उदाहरण है, जिसने देश में डिजिटल लेनदेन की तस्वीर बदल दी है।

इसके अलावा, रूस के साथ रुपये में व्यापार के दौरान रूस के पास बड़ी मात्रा में रुपये जमा हो जाने का अनुभव भी भारत के नजरिये को मजबूती देता है, जिनका उपयोग रूस प्रभावी ढंग से नहीं कर सका। बहुपक्षीय डिजिटल सिस्टम से ऐसी दिक्कतों से बचा जा सकेगा।

कैसे काम करेगा ब्रिक्स डिजिटल पेमेंट सिस्टम
यह प्रणाली दो प्रमुख तकनीकी स्तंभों पर आधारित होगी। पहला, सेटलमेंट साइकिल—जिसमें हर लेनदेन का तुरंत भुगतान नहीं होगा, बल्कि तय अवधि में आयात-निर्यात का हिसाब जोड़कर केवल शुद्ध अंतर राशि का निपटान किया जाएगा। इससे नकदी की जरूरत और लेनदेन लागत दोनों घटेंगी।

दूसरा, फॉरेक्स स्वैप लाइन—इसके जरिए जरूरत पड़ने पर सेंट्रल बैंक आपसी समझौते से मुद्राओं की अदला-बदली कर संतुलन बनाए रख सकेंगे।

डॉलर से दूरी क्यों बना रहे हैं देश
ब्रिक्स देशों में डॉलर के विकल्प की तलाश काफी समय से जारी है। रूस को स्विफ्ट सिस्टम से बाहर किए जाने और उसके करीब 300 अरब डॉलर के विदेशी भंडार फ्रीज किए जाने के बाद कई देशों ने इसे चेतावनी के तौर पर देखा। इससे पहले ईरान, उत्तर कोरिया और क्यूबा जैसे देशों के साथ भी इसी तरह के कदम उठाए जा चुके हैं।

ऐसे में ब्रिक्स का यह डिजिटल पेमेंट सिस्टम एक वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में उभर सकता है, जिससे वैश्विक संकट या प्रतिबंधों की स्थिति में भी सदस्य देशों का आपसी व्यापार प्रभावित न हो।

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