6 जुलाई को तिब्बती बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा 90 वर्ष के हो जाएंगे, लेकिन इससे पहले ही उनके उत्तराधिकारी को लेकर भारत और चीन के बीच विवाद गहराता जा रहा है। चीन ने साफ शब्दों में कहा है कि दलाई लामा के किसी भी भावी उत्तराधिकारी को उसकी मंजूरी जरूरी होगी, और इसी मुद्दे को लेकर उसने भारत को भी सीधी चेतावनी दी है।
चीन ने भारत से कहा है कि वह तिब्बत से जुड़े मामलों में “सावधानी” बरते, ताकि द्विपक्षीय संबंधों पर इसका नकारात्मक असर न पड़े। खासतौर पर, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू की उस टिप्पणी पर चीन ने आपत्ति जताई है जिसमें उन्होंने कहा था कि “दलाई लामा अपने उत्तराधिकारी का चयन स्वयं कर सकते हैं।”
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि भारत को दलाई लामा की “चीन विरोधी और अलगाववादी” प्रवृत्ति को समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत को तिब्बत (जिसे चीन ‘शिजांग’ कहता है) से जुड़े मसलों पर अपनी प्रतिबद्धताओं का सम्मान करना चाहिए और चीन के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
वहीं भारत की ओर से किरण रिजिजू ने साफ किया कि दलाई लामा और स्थापित तिब्बती संस्था ही अगली दलाई लामा की नियुक्ति करेंगी, इसमें किसी बाहरी शक्ति की कोई भूमिका नहीं होगी। यह दलाई लामा द्वारा हाल ही में दिए गए बयान के समर्थन में भारत सरकार की ओर से किसी वरिष्ठ अधिकारी की पहली सार्वजनिक प्रतिक्रिया थी।
बुधवार को दलाई लामा ने कहा था कि उनकी संस्था जारी रहेगी और केवल ‘गादेन फोडरंग ट्रस्ट’ को ही उनके उत्तराधिकारी को मान्यता देने का अधिकार होगा। इस ट्रस्ट की स्थापना 2015 में की गई थी।
इस बीच, माओ निंग ने दोहराया कि पंचेन लामा और दलाई लामा के उत्तराधिकारी का चयन ‘स्वर्ण कलश’ से लॉटरी, धार्मिक अनुष्ठानों, ऐतिहासिक परंपराओं और चीनी सरकार की मंजूरी के तहत होना चाहिए। उन्होंने कहा कि वर्तमान 14वें दलाई लामा भी इसी प्रक्रिया से चयनित हुए थे।
यह विवाद आने वाले समय में भारत-चीन संबंधों के लिए एक और संवेदनशील मोड़ साबित हो सकता है, खासकर जब दलाई लामा का उत्तराधिकारी चयन एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनने की ओर बढ़ रहा है।