महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा और ऐतिहासिक मोड़ देखने को मिल रहा है। हाल ही में संपन्न 288 नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों के नतीजों ने ‘ठाकरे ब्रांड’ को करारा झटका दिया है। इन परिणामों से सबक लेते हुए उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने करीब 20 साल पुरानी राजनीतिक कड़वाहट को भुलाकर एकजुट होने का फैसला किया है। जानकारी के मुताबिक, दोनों भाई बीएमसी समेत राज्य की 29 नगर निगमों के चुनाव एक साथ लड़ेंगे। इस गठबंधन का औपचारिक ऐलान मंगलवार को वर्ली स्थित एनएससीआई डोम में संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए किए जाने की संभावना है।
बीजेपी की बढ़त ने बनाया दबाव
हालिया निकाय चुनावों में बीजेपी के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन ने 70 प्रतिशत से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) सिंगल डिजिट में सिमट गई। वहीं, राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) का खाता तक नहीं खुल सका। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और बीजेपी की मजबूत जोड़ी ने उद्धव ठाकरे के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। इसी चुनौती से निपटने के लिए दोनों भाइयों का साथ आना तय माना जा रहा है। सोमवार देर शाम मनसे नेता बाला नांदगांवकर और नितिन सरदेसाई ने ‘मातोश्री’ पहुंचकर उद्धव ठाकरे से मुलाकात की और गठबंधन के फॉर्मूले पर अंतिम सहमति बनाई।
सीट बंटवारे पर बनी सहमति, चुनाव कार्यक्रम तय
सूत्रों के अनुसार, बीएमसी की 227 सीटों के बंटवारे को लेकर सहमति बन गई है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) 150 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ सकती है, जबकि मनसे को 60 से 70 सीटें मिलने की संभावना है। बाकी सीटें छोटे सहयोगी दलों के लिए छोड़ी जाएंगी। चुनाव आयोग ने अधिसूचना जारी कर दी है। मंगलवार से नामांकन प्रक्रिया शुरू होगी, जो 30 दिसंबर तक चलेगी। राज्य की सभी 29 महानगर पालिकाओं में 15 जनवरी को मतदान होगा और 16 जनवरी को नतीजे घोषित किए जाएंगे।
कांग्रेस को साथ रखना बड़ी चुनौती
इस नए समीकरण के बीच महा विकास आघाड़ी में कांग्रेस की भूमिका को संतुलित रखना आसान नहीं होगा। मनसे की उत्तर भारतीय विरोधी छवि के कारण कांग्रेस अब तक राज ठाकरे के साथ मंच साझा करने से बचती रही है। ऐसे में शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत कांग्रेस नेतृत्व, खासकर राहुल गांधी और शीर्ष आलाकमान के संपर्क में हैं, ताकि विपक्षी एकता बनी रहे और बीजेपी को सीधी चुनौती दी जा सके।
बीएमसी की जंग: ठाकरे विरासत की परीक्षा
यह चुनाव केवल नगर निकाय का नहीं, बल्कि ठाकरे परिवार की राजनीतिक विरासत बचाने की लड़ाई माना जा रहा है। मुंबई महानगरपालिका पर पिछले तीन दशकों से ठाकरे परिवार का प्रभाव रहा है और बीएमसी उनकी सियासी ताकत का प्रमुख आधार रही है। बीएमसी का बजट देश के कई छोटे राज्यों से भी अधिक है, जो संगठन को मजबूत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। वहीं, बीजेपी और एकनाथ शिंदे गुट की नजर भी इसी ‘सोने की चिड़िया’ पर टिकी है और उन्होंने 150 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है। अब देखना होगा कि ठाकरे भाइयों की यह एकजुटता मुंबई में उनकी पकड़ को बरकरार रख पाती है या नहीं।